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21 May, 2009

कहां फना होगया....।



कहां फना होगया....।
वो ढलती शामें
जब आती थी शबाब पर
तब होता था मिलना
हमारा-तुम्हारा।

कहां खो गया....।
वो ढलती रातें
जब होती थी उफान पर
वो छलकाना जाम
हमारा-तुम्हारा।

कहां गुम हो गया....।
लालिमा लिए आसमां
ढलती रात के साए में
तेरे आंगन में, होता था साथ
हमारा-तुम्हारा।

‘राज’ कहां फना हो गया
साथ हमारा-तुम्हारा।

आपका अपना
नीतीश राज

16 May, 2009

फिर आज मिले, बिना आहट



मिले तो हैं, पहले भी हम,
फिर आज मिले, बिना आहट,
जिंदगी और हम।

जिंदगी ने पूछा मुझसे,
आकर दबे पांव।
क्यों उदास बैठा,
कहां फंसी तेरी,
जिंदगी की नाव?

मैं, एक भंवर की तरह
लाखों सवालों से घिरा,
जिंदगी की तलाश में
भटकता रहा,
मंजिल की राह में।

कब होगी मुकम्मल
ख्वाहिश संग तलाश मेरी
फिर आज मिले, बिना आहट,
जिंदगी और हम।


आपका अपना
नीतीश राज

02 January, 2009

फिसले छलनी से

यह एहसास हुआ है
यूं ही इन दिनों, अचानक,
दुनिया कुछ दिनों में
बीसवीं सदी की केंचुली को
उतार फेंकने वाली है।

हर कोई बीसवीं सदी से
छुटकारा पाने को उतारु है,
जैसे,
कोई, अपने मैले-कुचले कपड़ो से।

मैं तो नहीं था तब
जब आई थी बीसवीं सदी,
कुछ लोग उठा लाए थे,
उन्नीसवीं सदी को साथ अपने
थे उनमें से कुछ
मीर, ग़ालिब, मूमिन, जौंक, मुसहफी।

समय की छलनी में बीसवीं सदी
को छानने बैठा हूं,
छेद कुछ इतने बड़े हो गए
सदी की छलनी के,
मीर भी देखो,
ग़ालिब भी देखो,
फिसल रहे हैं,
इक्कीसवीं सदी की छलनी से।

आपका अपना
नीतीश राज

(सभी के लिए नव वर्ष शुभ हो।)

17 December, 2008

निशान ‘ताज’ की दीवार का



धर्म का ना जात का
हजारों के आघात का
क्यों पनप रहा ये ज़हर
इंसानी जज़्बात का।

करता है छेद लाखों
दिल में मेरे,
जब भी देखता हूं
निशान ‘ताज’ की दीवार का।


आपका अपना
नीतीश राज


(फोटो साभार-गूगल)