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21 August, 2008

रोज ही देखा है मैंने एक ख्वाब



रोज ही देखा है मैंने एक ख्वाब
तेरा चेहरा, मेरे चेहरे के पास
उस चेहरे का मेरे चेहरे पे झुका होना
चेहरे पर चेहरा झुका होना।



वो तुम्हारा धीरे से मुस्कुरा देना
वो तुम्हारा, इतना पास देख मुझे
घबरा जाना, शर्मा जाना,
मेरा पलकों से तेरी आंखें ढक लेना।




वो मेरी तेज सांसों का
बार-बार तुम्हारे चेहरे से टकराना,
लेना महक तुम्हारी
लपेटे बाहों में तुम्हें,
और देखना
रोज की तरह ही एक ये ख्वाब।



आपका अपना
नीतीश राज

14 comments:

  1. रोज की तरह ही एक ये ख्वाब।
    अति सुन्दर
    धन्यवाद

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  2. वो तुम्हारा धीरे से मुस्कुरा देना
    वो तुम्हारा, इतना पास देख मुझे
    घबरा जाना, शर्मा जाना,
    मेरा पलकों से तेरी आंखें ढक लेना।
    " ek khubsurat khavb , najuk sa pyara sa, mehka sa"

    Regards

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  3. सुंदर लगा आपका यह ख्वाब .यूँ ही बुनते रहे और लिखते रहे

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  4. फ़ज़ाओ में रूमानियत भर दी आपने.. बहुत सुंदर

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  5. वो तुम्हारा धीरे से मुस्कुरा देना
    वो तुम्हारा, इतना पास देख मुझे
    घबरा जाना, शर्मा जाना,
    मेरा पलकों से तेरी आंखें ढक लेना।

    bahut khoob....

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  6. अच्छा लिखा है.... श्रंगार तब और खूबसूरत बन पड़ता है जब उसमें थोड़ी फंतासी के साथ कवि खुद को बहुत करीने से जोड़ जाए। कुछ ऐसा ही आभास थी ये रचना।

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  7. रूमानी रचना कहूँ तो ग़लत नहीं होगा!

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  8. वो मेरी तेज सांसों का
    बार-बार तुम्हारे चेहरे से टकराना,
    लेना महक तुम्हारी
    लपेटे बाहों में तुम्हें,
    और देखना
    रोज की तरह ही एक ये ख्वाब।


    बहुत खूबसूरत ! शुभकामनाएं !

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  9. वो मेरी तेज सांसों का
    बार-बार तुम्हारे चेहरे से टकराना,
    लेना महक तुम्हारी
    लपेटे बाहों में तुम्हें,
    और देखना
    रोज की तरह ही एक ये ख्वाब।बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई

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  10. नितीश जी धन्यवाद,
    मेरे ब्लाग पर पधारे आप,
    आपका असंतोष सही है,
    न आ पाया था आपके ब्लाग पर अभी तक,
    आज आ गया हूँ,
    अक्सर आया करूंगा,
    टिप्पणियां भी करूंगा,
    बहुत अच्छी कविता है आपने लिखी.

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  11. आप सभी का धन्यवाद

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